यह अभ्यास अपने प्रति प्रेम, दया और करुणा विकसित करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह न केवल मानसिक शांति देता है बल्कि आत्म-सम्मान (Self-esteem) भी बढ़ाता है।
अभ्यास के चरण (Step-by-Step Guide)
1. तैयारी (Preparation):
एक शांत स्थान चुनें जहाँ कोई आपको परेशान न करे। आराम से बैठें (सुखासन या कुर्सी पर)। अपनी रीढ़ सीधी रखें और आँखों को धीरे से बंद कर लें। 3-4 लंबी गहरी सांसें लें और महसूस करें कि आपका शरीर शिथिल (Relax) हो रहा है।
2. संकल्प (Focus):
अपने ध्यान को अपने हृदय के केंद्र (Heart Center) पर लाएं। कल्पना करें कि आपके भीतर से एक कोमल, सुनहरी रोशनी निकल रही है जो आपको शांति और सुरक्षा का अहसास दिला रही है।
3. पालि मंत्र और उनका अर्थ (Mantra Recitation):
इन प्राचीन पालि वाक्यों को धीरे-धीरे दोहराएं। हर शब्द के अर्थ को हृदय से महसूस करें:
अहं अवेरो होमि: “मैं शत्रुता और वैर-भाव से मुक्त रहूँ।”
अब्यापज्झो होमि: “मैं मानसिक कष्टों और चिंता से मुक्त रहूँ।”
अनीघो होमि: “मैं शारीरिक पीड़ा और रोगों से मुक्त रहूँ।”
सुखी अत्तानं परिहरामि: “मैं कुशलतापूर्वक और सुख से अपना जीवन व्यतीत करूँ।”
धम्म प्रवचन के रूप में चिंतन (Contemplation)
ध्यान के दौरान अपने मन में इन सकारात्मक भावों को दोहराएं:
”मैं अपने आप को वैसा ही स्वीकार करता हूँ जैसा मैं हूँ। मैं अपनी गलतियों के लिए खुद को क्षमा करता हूँ। मेरा मन शांत रहे, मेरा शरीर स्वस्थ रहे और मेरा जीवन मंगलमय हो।”
महत्वपूर्ण सुझाव:
निरंतरता (Consistency): इसे प्रतिदिन सुबह 5 से 10 मिनट तक करें। जैसे-जैसे आप अभ्यास करेंगे, आपको अपने व्यवहार में अधिक धैर्य और शांति महसूस होगी।
स्वयं के प्रति कोमलता: यदि ध्यान के दौरान मन भटक जाए या मन में नकारात्मक विचार आएं, तो परेशान न हों। धीरे से अपना ध्यान वापस मैत्री के भाव पर ले आएं।
विस्तार: जब आप स्वयं के लिए मैत्री महसूस करने लगें, तो धीरे-धीरे इसे अपने परिवार, मित्रों और अंत में समस्त संसार के प्राणियों के लिए विस्तारित करें (सब्बे सत्ता सुखी होंतु – सभी प्राणी सुखी हों)।
