14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षा भूमि में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्वयं सहित लाखों अनुयायियों को बौद्ध धर्म में दीक्षादान किया।
इस अवसर पर उन्होंने अनुयायियों से 22 प्रतिज्ञाएँ (22 Vows) दिलाईं — ये केवल धार्मिक प्रतिज्ञाएँ नहीं थीं, बल्कि जाति-भेद, अस्पृश्यता और अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग भी थीं।
🟦 22 प्रतिज्ञाएँ — सार (Translated Meaning)
ये प्रतिज्ञाएँ बौद्ध धम्म और नवयान (Navayana) के सिद्धांतों को जीवन में उतारने के लिए हैं:
🟩 1–6: अंधविश्वास और पुरानी पद्धतियों का त्याग
1. मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा और न उनकी पूजा करूंगा।
2. राम और कृष्ण को ईश्वर नहीं मानूंगा और पूजा नहीं करूंगा।
3. गौरी, गणपति और अन्य देवी-देवताओं की पूजा नहीं करूंगा।
4. ईश्वर के अवतार में विश्वास नहीं रखूँगा।
5. मैं यह नहीं मानता कि बुद्ध विष्णु के अवतार हैं।
6. मैं श्राद्ध और पिंडदान नहीं करूंगा।
👉 इन प्रतिज्ञाओं का उद्देश्य था पिछड़ी और ऊँची-नीची मान्यताओं से मुक्त होना और तर्कपूर्ण, समानाधिकार आधारित जीवन स्वीकारना।
🟩 7–18: बौद्ध धम्म की शिक्षा का पालन
7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों के विपरीत कार्य नहीं करूंगा।
8. मैं बोधिसत्त्वों द्वारा संचालित कर्मकांडों में ब्राह्मणों का आधिपत्य नहीं स्वीकारूँगा।
9. मैं मानव समानता में विश्वास रखूँगा।
10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूंगा।
11. मैं बुद्ध के नवआयामिक मार्ग (Eightfold Path) का पालन करूंगा।
12. मैं बुद्ध द्वारा बताए गए दश परमार्थ (Ten Paramitas) का अभ्यास करूंगा।
13. मैं सभी प्राणियों के प्रति करुणा दिखाऊँगा और उनका संरक्षण करूंगा।
14. मैं चोरी नहीं करूंगा।
15. मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
16. मैं अश्लील व्यवहार नहीं करूँगा।
17. मैं शराब, मादक पदार्थ आदि नहीं लूंगा।
18. मैं रोज़मर्रा की जिंदगी में करुणा और प्रेम का अभ्यास करूंगा।
👉 इस समूह का लक्ष्य था नैतिकता, संयम और आत्म-शुद्धि को जीवन का मार्ग बनाना।
🟩 19–22: सामाजिक लक्ष्य और जीवन का नया दृष्टिकोण
19. मैं हिंदू धर्म को त्यागता हूँ क्योंकि वह मानवता के लिए हानिकारक है और असमानता बनाए रखता है, और मैं बौद्ध धर्म को अपना religion मानता हूँ।
20. मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि बुद्ध का धम्म ही सत्य मार्ग है।
21. मैं मानता हूँ कि मैंने नया जन्म लिया है (धार्मिक और सामाजिक रूप से)।
22. मैं जीवन भर बुद्ध के शिक्षाओं के अनुसार ही जीवन जीने की प्रतिज्ञा करता हूँ।
🟦 इन 22 प्रतिज्ञाओं का सामाजिक प्रभाव
📌 1) समानता का सशक्त संदेश
इन प्रतिज्ञाओं ने स्पष्ट किया कि सभी मनुष्य समान हैं और कोई भी जाति-भेद स्वीकार्य नहीं है।
📌 2) अंधविश्वास और पाखंड से मुक्ति
प्रतिज्ञाएँ इन्द्रियों पर नियंत्रण, मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता और रational सोच को बढ़ावा देती हैं।
📌 3) सामाजिक क्रांति का मार्ग
ये प्रतिज्ञाएँ नवयान बौद्ध धम्म की नींव हैं — जो केवल मोक्ष या पूजा का मार्ग नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकार का आंदोलन है।
📌 4) आधुनिक भारतीय लोकतंत्र का समर्थन
प्रतिज्ञाओं में समानता, करुणा, सत्य और नैतिकता जैसे मूल्य हैं — जो भारतीय संविधान के मूल्यों से प्रत्यक्ष रूप से मेल खाते हैं।
🟦 निष्कर्ष
डॉ. आंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ केवल बौद्ध धर्म की शपथ नहीं थीं —
ये मानव-केंद्रित, तर्क-आधारित, सामाजिक और नैतिक जीवन के नियम हैं, जो आज भी न्याय, समानता और करुणा के लिए प्रासंगिक हैं।
