एक समय भगवान कुरु-प्रदेश में कुरुओं के निगम कम्मासधम्म में विहार करते थे।
▫️ उस समय भिक्षुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ये जो चार स्मृति-प्रस्थान हैं वे सत्वों की विशुद्धि, शोक और क्रंदन का विनाश, दुःख और दौर्मनस्य का अवसान, सत्य की प्राप्ति, निर्वाण का साक्षात्कार — इन सब के लिए अकेला मार्ग है।
चार स्मृति-प्रस्थान हैं —
▫️ लोलुपता और दौर्मनस्य को दूर कर, स्मृति और संप्रज्ञान के साथ, उद्योगशील हो —
काया में कायानुपश्यी हो कर विहरना,
वेदनाओं में वेदनानुपश्यी हो कर,
चित्त में चित्तानुपश्यी हो कर,
धर्मों में धर्मानुपश्यी हो कर विहरना।
कायानुपश्यना —
भिक्षु किसी निर्जन स्थान पर जा कर, पालथी मार, शरीर को सीधा रख, मुख के इर्द-गिर्द जागरूकता बनाये रख, नैसर्गिक तौर पर आने-जाने वाले श्वास को जानने का काम शुरू करता है।
फिर सारी काया को अनुभव करते हुए, और तदुपरांत कायापर होने वाले उपद्रवों के शांत होने पर, श्वास लेना व छोड़ना सीखता है।
इस प्रकार —
काया के भीतरी अथवा बाहरी; अथवा भीतरी और बाहरी दोनों प्रकार के भागों में कायानुपश्यना करता हुआ विहार करता है।
काया में उदय अथवा व्यय; अथवा उदय के साथ-साथ व्यय होने वाले धर्मों का अनुपश्यी हो कर विहार करता है।
तब “यह काया है!” — इस पर जागरूकता स्थिर हो जाती है।
जितनी देर तक इस प्रकार का केवल ज्ञान, केवल दर्शन बना रहता है — उतनी देर तक अनासक्त हो कर विहार करता है और संसार में कुछ भी ग्रहण करने योग्य नहीं रहता।
▫️ इस प्रकार काया में कायानुपश्यी होकर विहार करना होता है।
अन्य अवस्थाएँ और क्रियाएँ —
▫️ केवल बैठे-बैठे ही नहीं — चलते-फिरते, खड़े रहते, लेटे-लेटे अथवा शरीर की अन्य अवस्थाओं में भी, इन अवस्थाओं को यथाभूत जानते हुए, कायानुपश्यना की जाती है।
▫️ आगे बढ़ कर — हर प्रकार की शारीरिक क्रिया में संप्रज्ञान बनाये रख कर कायानुपश्यना करनी होती है।
▫️ शरीर के भीतर अशुचि (प्रतिकूल विषयों) को आलंबन बना कर उक्त प्रकार से कायानुपश्यना करनी होती है।
वेदनानुपश्यना —
▫️ जैसी भी वेदना अनुभव हो —
सुखद, दुःखद, अदुःखद-असुखद, सामिष, निरामिष — उसे प्रज्ञापूर्वक यथाभूत जानना होता है।
▫️ पूर्ववत भीतर, बाहर, सर्वत्र उदय-व्यय की अनुभूति के साथ विहार करना होता है।
▫️ जिससे जागरूकता स्थिर हो कर केवल इसी बात का ज्ञान अथवा दर्शन प्राप्त हो — “यह वेदना है!”
चित्तानुपश्यना —
▫️ जैसी भी चित्त की स्थिति हो —
रागयुक्त, रागविहीन; द्वेषयुक्त, द्वेषविहीन; मोहयुक्त, मोहविहीन — उसे प्रज्ञापूर्वक यथाभूत जानना होता है।
▫️ पूर्ववत भीतर, बाहर, सर्वत्र उदय-व्यय की अनुभूति के साथ विहार करना होता है।
▫️ जिससे जागरूकता स्थिर हो कर केवल इसी बात का ज्ञान अथवा दर्शन प्राप्त हो — “यह चित्त है!”
धर्मानुपश्यना —
▫️ चित्त में जागने वाले धमों की जैसी-जैसी स्थिति हो — उन्हें प्रज्ञापूर्वक यथाभूत जानना होता है।
▫️ पूर्ववत भीतर, बाहर, सर्वत्र उदय-व्यय की अनुभूति के साथ विहार करना होता है।
▫️ जिससे जागरूकता स्थिर होकर केवल इसी बात का ज्ञान अथवा दर्शन प्राप्त हो — “ये धर्म हैं!”
नीवरणों की धर्मानुपश्यना —
▫️ प्रज्ञापूर्वक यह जानना होता है —
इस समय नीवरण है, अथवा नहीं है,
अथवा उत्पन्न हो रहा है, अथवा इसका प्रहाण हो रहा है,
अथवा प्रहाण हुए-हुए का अब पुनः उद्भव नहीं होता है।
▫️ नीवरण हैं —
1. कामच्छंद = कामुक ता
2. व्यापाद = द्रोह
3. स्त्यानमृद्ध = तन-मन का आलस
4. औद्धत्य-कीकृत्य = उद्वेग, खेद
5. विचिकित्सा = संदेह
उपादान-स्कंधों की धर्मानुपश्यना —
▫️ प्रज्ञापूर्वक यह जानना — इस समय स्कंध उदय हो रहा है अथवा अस्त हो रहा है।
▫️ उपादान-स्कंध —
1. रूप
2. वेदना
3. संज्ञा
4. संस्कार
5. विज्ञान
आयतनों की धर्मानुपश्यना —
▫️ प्रज्ञापूर्वक यह जानना —
यह भीतर का आयतन है, यह बाहर का आयतन है,
यह दोनों के संसर्ग से होने वाला संयोजन है,
यह अविद्यमान संयोजन की उत्पत्ति है,
यह उत्पन्न हुए संयोजन का प्रहाण है,
यह प्रहाण हुए-हुए संयोजन का अब अनुद्भव है।
▫️ आयतन —
1. बाह्य-चक्षु
2. श्रोत्र
3. घ्राण (नासिका)
4. जिव्हा
5. काय (त्वक)
6. आभ्यंतर मन तथा उनके विषय
बोध्यंगों की धर्मानुपश्यना —
▫️ प्रज्ञापूर्वक यह जानना —
इस समय बोध्यंग है, अथवा नहीं है,
अथवा उत्पन्न हो रहा है, अथवा भावित हो कर परिपूर्ण हो रहा है।
▫️ बोध्यंग —
1. स्मृति
2. धर्मविचय
3. वीर्य
4. प्रीति
5. प्रश्रव्धि
6. समाधि
7. उपेक्षा
आर्य-सत्यों की धर्मानुपश्यना —
▫️ प्रज्ञापूर्वक, यथाभूत, यह जानना —
यह दुःख है,
यह दुःख का समुदय है,
यह दुःख का निरोध है,
यह दुःख-निरोध का उपाय है।
भगवान का स्पष्टीकरण —
▫️ दुःख, दुःख का समुदय, दुःख का निरोध और दुःख-निरोध का उपाय — इनसे अभिप्राय है —
पाँचों उपादान-स्कंध ही “दुःख” हैं।
बार-बार राग जगाने वाली तृष्णा “दुःख का समुदय” है।
इस तृष्णा का सर्वथा निरोध “दुःख का निरोध” है।
आर्य अष्टांगिक मार्ग (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक क मति, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि) “दुःख-निरोध का उपाय” है।
अवधि और फल —
▫️ जो कोई मेरे बतलाये अनुसार इन चार स्मृति-प्रस्थानों की सात वर्ष भावना करे — उसे इन दो फलों में से एक की आशा रखनी चाहिए —
इसी जन्म में अर्हत्व का साक्षात्कार
अथवा उपाधि शेष होने पर अनागामि-भाव।
▫️ भगवान ने आगे प्रज्ञप्त किया कि इससे कहीं कम अवधि में भी इस फल की आशा की जा सकती है।
सब का मङ्गलं हो, सब हमेशा सुखी रहें।
